इस बार जब ठंडी की छुट्टी पर घर आया तो कमरे की सफाई के दौरान कुछ पुराने ग्रीटिंग कार्ड पर नजर पड़ी जो बचपन में छोटे बच्चे एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई के रूप में दिया करते थे ।एक क्षण के लिए बचपन की यादें ताजा हो उठी ।वह सारा बचपन एक फिल्म की तरह यादों से गुजर उठी ।वह क्रिकेट का मैदान जिसमें स्कूल से आने के बाद अक्सर समय गुजरा करता था जब तक के घर से खुद मां हाथ में डंडे लेकर ना बुलाने आ जाए, वह आम का बगीचा जिसमें हम सभी दोस्त हाथ में डंडे और ईंट के टुकड़े लेकर तब तक आम को तोड़ने की कोशिश करते जब तक के बगीचे का रखवाला जोर-जोर से रुको रुको की आवाज लगाता हुआ हमें पकड़ने के लिए ना दौड़ पड़े ।वह सभी यादों से मस्तिष्क झूम उठा जो हम बचपन में किया करते थे ,परंतु अब गांव के परिस्थिति में परिवर्तन आ चुका है अब ना क्रिकेट का मैदान है और ना वह बगीचा ,शायद अब वह बचपन भी नहीं है । नगरीय भौतिकवादी संस्कृति अब गांव में पैर पसार चुकी है । बच्चों के मोटे मोटे बस्तों के साथ , बड़ों के अपने अपने काम की व्यस्तता के बीच ऐसा लगता है कि बचपन कहीं खो सा गया है।
कृष्ण कुमार गुप्ता
प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (हिन्दी),रामपुर
सत्य कहा है।👍
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