Skip to main content

Posts

Showing posts from January, 2020

ज़रा #बुझ #के #देखो #कि .....ये खेल क्या है????

मिरे मुखालिफ़ ने चाल चल दी है  और अब मेरी चाल के इंतेज़ार में है मगर मैं कब से सफ़ेद खानों सियाह खानों में रक्खे काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ मैं सोचता हूँ ये मोहरे क्या हैं अगर मैं समझूँ कि ये जो मोहरे हैं सिर्फ लकड़ी के हैं खिलौने तो जीतना क्या है हारना क्या न ये ज़रूरी न वो अहम है अगर खुशी है न जीतने की न हारने का ही कोई ग़म है तो खेल क्या है मैं सोचता  हूँ जो खेलना है तो अपने दिल में यक़ीन कर लूँ ये मोहरे सचमुच के बादशाहो-वज़ीर सचमुच के हैं प्यादे और इनके आगे है दुश्मनों की वो फ़ौज रखती है जो कि मुझको तबाह करने के सारे मनसूबे सब इरादे मगर मैं ऐसा जो मान भी लूँ तो सोचता हूँ ये खेल कब है ये जंग है जिसको जीतना है ये जंग है जिसमें सब है जायज़ कोई ये कहता है जैसे मुझसे ये जंग भी है ये खेल भी है ये जंग है पर खिलाड़ियों की ये खेल है जंग की तरह का मैं सोचता हूँ जो खेल है इसमें इस तरह का उसूल क्यों है कि कोई मोहरा रहे कि जाए मगर जो है बादशाह उसपर कभी कोई आँच भी न आए वज़ीर ही को है बस इजाज़त कि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए मैं सोचता हूँ जो खेल है इसमें इस तरह का उसूल क्यों है प्यादा जो ...

खोया खोया बचपन

इस बार जब ठंडी की छुट्टी पर घर आया तो कमरे की सफाई के दौरान कुछ पुराने ग्रीटिंग कार्ड पर नजर पड़ी जो बचपन में छोटे बच्चे एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई के रूप में दिया करते थे ।एक क्षण के लिए बचपन की यादें ताजा हो उठी ।वह सारा बचपन एक फिल्म की तरह यादों से गुजर उठी ।वह क्रिकेट का मैदान जिसमें स्कूल से आने के बाद अक्सर समय गुजरा करता था जब तक के घर से खुद मां हाथ में डंडे लेकर ना बुलाने आ जाए, वह आम का बगीचा जिसमें हम सभी दोस्त हाथ में डंडे और ईंट के टुकड़े लेकर तब तक आम को तोड़ने की कोशिश करते जब तक के बगीचे का रखवाला जोर-जोर से रुको रुको की आवाज लगाता हुआ हमें पकड़ने के लिए ना  दौड़ पड़े ।वह सभी यादों से मस्तिष्क झूम उठा जो हम बचपन में किया करते थे ,परंतु अब गांव के परिस्थिति में परिवर्तन आ चुका है अब ना क्रिकेट का मैदान है और ना वह बगीचा ,शायद अब वह बचपन भी नहीं है । नगरीय भौतिकवादी संस्कृति  अब गांव में पैर पसार चुकी है । बच्चों के मोटे मोटे बस्तों के साथ , बड़ों के  अपने अपने काम की व्यस्तता के बीच ऐसा लगता है कि बचपन कहीं खो सा गया है। कृष्ण कुमार गुप्ता प्रशिक्षित स्नात...